मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

और खेत बिक गया...

वो गरीब परिवार रात भर नहीं सो पाया। घर के हर शख्स की आंख में आंसू थे। वजह ये थी कि उनका खेत बिक चुका था। कहने को तो वो अपना खेत बोलते थे, लेकिन हकीकत में वो सिर्फ बटाईदार थे। उनके बाप-दादाओं ने भी इसी खेत में फसल की थी। अपने छुटपन में वो बाबा के लिए इसी खेत में पानी लेकर आते थे। गर्मियों की दुपहरी पास में लगे कटहल की छांव में गुजरते थे। समय बीता और अब उनके बच्चे यही सब उनके लिए कर रहे थे। उनकी जिंदगी में भी आर्थिक दिक्कतें थीं लेकिन, फिर भी वो खुशहाल किसान परिवार था। कल खेत के मालिक ने खेत बेच दिया। खेत में महीने भर पहले लाही बोई गई थी। पूरे खेत में नन्हें-नन्हें पौधे निकले थे। नए खरीददार से इतना भी न रुका गया की फसल पककर कटने का इंतजार कर लेता। कल ही शाम को जेसीबी आई और पूरा खेत उजाड़ दिया। बटाईदार ने मिन्नतें की थीं - 'लाला थोड़ा रुक जाओ। नान- नान केर फसल है। बच्चा समान फसल का पालो है। फागुन बाद जो मन होए करवा देहेव।' लेकिन, उन्होंने कुछ न सुनी। आज सुबह उजड़े खेत के पास उसका पुराना मालिक तो नहीं आया, लेकिन बटाईदार का पूरा परिवार खड़ा था। बोले - खेत तो सिर्फ लिखाप ढ़ी में दूसरे का था। यहां हमारे बाप-दादाओं ने यहां की जमीन बैलों से जोती है। जबसे सुध आई तबसे रोज खेत आना जाना हुआ। अब इधर से गुजरने का भी मन नहीं होगा। सही बात है ये खेत कभी मालिक का हुआ ही नहीं। ये खेत उस बटाईदार का था जिसने पानी लगाया, फसल बोई। ये खेत लाही, सरसों के फूलों पर बैठने वाली मधुमक्खियों, तितलियों का था, मक्के की फसल पर आने वाले तोतों का था, तमाम उन मोरों का था, जुताई के समय कीड़े खाने वाले बक्कों का था, गौरैयाओं का था, तमाम छोटे - छोटे कीट पतंगों का था। केचुओं का था। मिट्टी ढोने वाले गुबरैलों का था। ... अब ये खेत मौरंग का होगा, सीमेंट का होगा। लाल, सफेद टाइल्स का होगा। यहां अब कंक्रीट की फसल होगी... (विकास का एक दूसरा पहलू यह भी है।)

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