मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022
जिद पूरी हुई
1997 का साल था। हांगकांग में रहने वाले गुओ गैंगटैंग के दो साल के बेटे गुओ शेनहेन का अपहरण हुआ। पुलिस में शिकायत हुई और केस दर्ज हुआ। हफ्ता बीता, महीना बीता और धीरे-धीरे साल बीतने की कगार पर आ गया। बच्चे का कोई सुराग नहीं लगा।
अपना बच्चा खोने के बाद गुओ गैंगटैंग को चैन नहीं था। एक-एक दिन काटे नहीं कटता था। कहीं कुछ न होता देख गैंगटैंग खुद मोटरसाइकिल उठाकर बच्चे को ढूंढने निकल पड़ा। इधर-उधर पता लगाना शुरू कर दिया। उसने जिद ठानी कि जब तक बेटा नहीं मिलेगा वह ढूंढता ही रहेगा। सालों तक गैंगटैंग बाइक पर ही अपना जीवन बिताता रहा। उसका जीवन हिप्पी की तरह था। मोटरसाइकिल में दो से तीन झंडे लगे होते, जिनमें उसके बेटे की फोटो बनी होती। इस राज्य से उस राज्य, इस शहर से उस शहर गैंगटैंग मोटरसाइकिल से घूमता रहा। सारी जमा पूंजी खर्च हो गई, उधार चढ़ गया। कड़कड़ाती ठंड और झुलसाती गर्मी में गैंगटैंग का सहारा बस उसकी बाइक, बेटे के मिलने की उम्मीद और उसे ढूंढने का जुनून था। हालातों और किस्मत ने उसे हद दर्जे तक तोड़ने की कोशिश की। लेकिन, गैंगटैंग ने जिद नहीं छोड़ी। उसने पूरा चीन छान डाला। पांच लाख किलोमीटर बाइक चलाई। उसे पूरे सफर में 10 बाइकें बदलनी पड़ीं।
सफर जब शुरू हुआ था तो गैंगटैंग के मन में सवाल कौंधता कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? सफर ने उसे बहुत कुछ सिखाया। उसे पता चला कि उससे जैसे और उससे ज्यादा बुरा झेलने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है। उसने देखा कि कई लोगों की सूनी आंखें अपनों की तलाश में हैं। गैंगटैंग को अपना बच्चा तो नहीं मिला, लेकिन उसने पूरे सफर में करीब-करीब 100 ऐसे बच्चों को छुड़ाया, जिनका अपहरण हुआ था। टीवी, अखबार हर जगह पर गैंगटैंग ही गैंगटैंग छा गया... मोटरसाइकिल वाला गैंगटैंग...। गैंगटैंग के संघर्ष पर 2015 में एक मूवी बनी- 'लास्ट एंड लव'।
- कहते हैं किस्मत कब मेहरबान हो पता नहीं। बीते रविवार को कुछ अविश्वसनीय हुआ। पुलिस ने गैंगटैंग के बेटे गुओ शेनहेन को हेनन प्रांत से ढूंढ निकाला। पुलिस ने उसका अपहरण करने वाले हू और उसकी गर्लफ्रेंड टैंग को भी गिरफ्तार कर लिया। पता चला दोनों ने शेनहेन का अपहरण करके एक अमीर घराने को बेच दिया था। पूरे 24 साल बाद गैंगटैंग को उसका बेटा मिला। 26 साल का शेनहेन नौजवान हो चुका था। पुलिस ने उसे जब उसके परिजनों से मिलवाया तो आंसू की झड़ी लग गई। पिता ने जोर से गले लगाया और कहा- "मेरी जिद थी, मैं तुम्हें ढूंढने के बाद ही मरूंगा।"
और खेत बिक गया...
वो गरीब परिवार रात भर नहीं सो पाया। घर के हर शख्स की आंख में आंसू थे। वजह ये थी कि उनका खेत बिक चुका था। कहने को तो वो अपना खेत बोलते थे, लेकिन हकीकत में वो सिर्फ बटाईदार थे। उनके बाप-दादाओं ने भी इसी खेत में फसल की थी। अपने छुटपन में वो बाबा के लिए इसी खेत में पानी लेकर आते थे। गर्मियों की दुपहरी पास में लगे कटहल की छांव में गुजरते थे। समय बीता और अब उनके बच्चे यही सब उनके लिए कर रहे थे। उनकी जिंदगी में भी आर्थिक दिक्कतें थीं लेकिन, फिर भी वो खुशहाल किसान परिवार था।
कल खेत के मालिक ने खेत बेच दिया। खेत में महीने भर पहले लाही बोई गई थी। पूरे खेत में नन्हें-नन्हें पौधे निकले थे। नए खरीददार से इतना भी न रुका गया की फसल पककर कटने का इंतजार कर लेता। कल ही शाम को जेसीबी आई और पूरा खेत उजाड़ दिया। बटाईदार ने मिन्नतें की थीं - 'लाला थोड़ा रुक जाओ। नान- नान केर फसल है। बच्चा समान फसल का पालो है। फागुन बाद जो मन होए करवा देहेव।' लेकिन, उन्होंने कुछ न सुनी। आज सुबह उजड़े खेत के पास उसका पुराना मालिक तो नहीं आया, लेकिन बटाईदार का पूरा परिवार खड़ा था। बोले - खेत तो सिर्फ लिखाप
ढ़ी में दूसरे का था। यहां हमारे बाप-दादाओं ने यहां की जमीन बैलों से जोती है। जबसे सुध आई तबसे रोज खेत आना जाना हुआ। अब इधर से गुजरने का भी मन नहीं होगा।
सही बात है ये खेत कभी मालिक का हुआ ही नहीं। ये खेत उस बटाईदार का था जिसने पानी लगाया, फसल बोई। ये खेत लाही, सरसों के फूलों पर बैठने वाली मधुमक्खियों, तितलियों का था, मक्के की फसल पर आने वाले तोतों का था, तमाम उन मोरों का था, जुताई के समय कीड़े खाने वाले बक्कों का था, गौरैयाओं का था, तमाम छोटे - छोटे कीट पतंगों का था। केचुओं का था। मिट्टी ढोने वाले गुबरैलों का था।
... अब ये खेत मौरंग का होगा, सीमेंट का होगा। लाल, सफेद टाइल्स का होगा। यहां अब कंक्रीट की फसल होगी...
(विकास का एक दूसरा पहलू यह भी है।)
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